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*प्रशासनिक तंत्र की विफलता से फल-फूल रहा अवैध धान कारोबार* *किसानों से अधिक बिचौलियों को मिल रहा समर्थन मूल्य का लाभ*

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प्रशासनिक तंत्र की विफलता से फल-फूल रहा अवैध धान कारोबार

किसानों से अधिक बिचौलियों को मिल रहा समर्थन मूल्य का लाभ

कोंडागांव | 31 जनवरी 2026

कोंडागांव जिले में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के नाम पर प्रशासनिक तंत्र की गंभीर विफलता एक बार फिर उजागर हुई है। सरकार द्वारा 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जा रही धान खरीदी का वास्तविक लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा, जबकि गल्ला व्यापारी और बिचौलिए इस व्यवस्था से मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, जिले की सीमाएं—विशेषकर पड़ोसी राज्य ओडिशा से लगने वाले मार्ग—अवैध धान परिवहन के प्रमुख रास्ते बन चुके हैं। इन मार्गों पर लगाए गए चेक पोस्ट और निगरानी तंत्र केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं। इन्हीं रास्तों से बड़े पैमाने पर बाहरी धान जिले में प्रवेश कर रहा है, जिसे स्थानीय किसानों के नाम पर समितियों में खपाया जा रहा है।

किसानों के पट्टों पर खप रहा बाहरी धान

सूत्र बताते हैं कि बिचौलिए पड़ोसी राज्यों से कम कीमत पर धान खरीदकर उसे स्थानीय किसानों के पट्टों में दर्ज करवा रहे हैं। कई मामलों में खुले बाजार से खरीदा गया धान भी किसानों के नाम पर समर्थन मूल्य में बेचा जा रहा है। सीमावर्ती गांवों और अंदरूनी मार्गों पर स्थित चेक पोस्टों पर कर्मचारियों की सक्रियता लगभग नदारद है, जिससे बिचौलियों के हौसले बुलंद हैं।

प्रशासन के दावे बनाम जमीनी हकीकत

जिला प्रशासन का दावा है कि पिछले खरीफ सीजन की तरह इस बार भी चेक पोस्ट लगाकर कर्मचारियों की तैनाती की गई है और अवैध धान कारोबार पर रोक के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों से उलट है, जहां अवैध धान बिना किसी रोक-टोक के खरीदी केंद्रों तक पहुंच रहा है।

मंडी कर्मचारियों और बिचौलियों की मिलीभगत का आरोप

जानकारी के मुताबिक मंडी कर्मचारी, समिति कर्मचारी, बिचौलिए और कुछ तथाकथित किसानों की मिलीभगत से बाहरी धान को वैध दिखाकर खरीदी की जा रही है। गिरदावरी जैसी व्यवस्थाएं होने के बावजूद चालू खरीफ सीजन में अवैध धान खपाना बिचौलियों के लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं रह गई है।

जांच के नाम पर खानापूर्ति

हाल ही में झारा-करियाकाटा क्षेत्र में अवैध धान परिवहन की शिकायत पर भेजी गई जांच टीम की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि मौके पर केवल पंचनामा कर औपचारिकता निभाई गई और अवैध धान को वैध घोषित कर बिचौलियों को क्लीन चिट दे दी गई। जिस गोदाम के किराए पर होने का दावा किया गया, वह भौतिक रूप से मौजूद ही नहीं था। निर्माणाधीन मकानों को गोदाम मान लिया गया, जबकि संबंधित रेंट एग्रीमेंट भी कई माह पूर्व ही कालातीत हो चुका था।

फूड इंस्पेक्टर मनी बघेल ने जांच एसडीएम के निर्देश पर होने और रिपोर्ट मंडी सचिव के पास होने की बात कही, वहीं मंडी सचिव विनोद कोडोपी अवैध गोदाम और परिवहन को लेकर स्पष्ट जानकारी देने में असमर्थ नजर आए।

बड़ा सवाल

अब सवाल यह है कि इस कथित लापरवाही और संभावित मिलीभगत से शासन को हो रहे भारी आर्थिक नुकसान पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या सख्त कार्रवाई होगी, या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।