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*पूर्व विधायक का सख्त रुख — बोले, शिक्षक का स्थान क्लासरूम में है, दफ्तर में नहीं।* 

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इमरान पारेख कोण्डागांव जिला ब्यूरो

 

*शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में न लगाएं सरकार : संतराम नेताम*

 

*पूर्व विधायक का सख्त रुख — बोले, शिक्षक का स्थान क्लासरूम में है, दफ्तर में नहीं।*

 

केशकाल। पूर्व विधायक संतराम नेताम ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से किसी भी प्रकार का गैर-शैक्षणिक या प्रशासनिक कार्य कराना शिक्षा के हित में नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “शिक्षक का स्थान क्लासरूम में है, न कि सरकारी दफ्तरों में।”

 

नेताम ने कई जिलों से आई शिकायतों पर गंभीर चिंता जताई कि शिक्षकों को पढ़ाई छोड़कर जाति प्रमाण पत्र सत्यापन, गिरदावरी, युक्तिकरण और अन्य दफ्तरी कार्यों में लगाया जा रहा है। उन्होंने इसे “शिक्षकों और विद्यार्थियों दोनों के साथ अन्याय” बताया।

 

पूर्व विधायक ने कहा, “अध्यापक केवल सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को गढ़ने वाले ज्ञान के दीपक हैं। एक ओर डबल इंजन की विष्णुदेव सरकार शिक्षा गुणवत्ता सुधार की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य कराना हिटलरशाही से कम नहीं।”

 

उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी दबाव बनाकर शिक्षकों से काम करवा रहे हैं और नियत समय में काम पूरा न होने पर वेतन रोकने की धमकी दी जाती है। इससे शिक्षक मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान हैं।

 

नेताम ने मांग की कि सरकार ऐसे अफसरशाही आदेश तुरंत वापस ले और शिक्षकों को केवल शैक्षणिक कार्यों में ही संलग्न रखे। यदि गैर-शैक्षणिक कार्यों की आवश्यकता है तो बेरोजगार युवाओं को अवसर देकर रोजगार सृजन किया जाए।

 

उन्होंने कहा कि शिक्षकों को जनगणना, आपदा राहत या चुनाव जैसे कार्यों में ही लगाया जा सकता है, क्योंकि शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की धारा 27 के अनुसार अन्य किसी कार्य के लिए शिक्षकों की नियुक्ति अवैध है।

 

 

 

शिक्षा की जड़ें मजबूत करने की जरूरत : नेताम

 

संतराम नेताम ने कहा कि प्राथमिक शिक्षा की मजबूती ही संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ है। सरकार को शिक्षकों की वास्तविक समस्याएं जैसे मिड डे मील, आवास, प्रशिक्षण और अत्यधिक कागजी कार्यवाही पर ध्यान देना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि जब तक राजनैतिक हस्तक्षेप कम नहीं होगा और शिक्षकों को स्वतंत्र वातावरण नहीं मिलेगा, तब तक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार संभव नहीं है।

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